
जनपद से ‘फाइल गायब’ का खेल! 25 साल पुरानी अनुकम्पा नियुक्ति पर बड़ा घोटाला, अधिकारी पर गंभीर आरोप
कोरबा।छत्तीसगढ़ के कोरबा जनपद पंचायत में एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है, जिसने पूरे प्रशासनिक तंत्र को कटघरे में खड़ा कर दिया है। वर्ष 1999 में हुई एक अनुकम्पा नियुक्ति अब गंभीर विवाद का विषय बन गई है। इस पूरे प्रकरण में दस्तावेजों के गायब होने और फर्जी नियुक्ति की आशंका ने भ्रष्टाचार की गहरी परतों को उजागर कर दिया है। पत्रकार एवं आरटीआई कार्यकर्ता जितेन्द्र कुमार साहू ने इस मामले को उजागर करते हुए अपर मुख्य सचिव, पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग को विस्तृत शिकायत भेजी है। शिकायत में उच्च स्तरीय जांच के साथ कठोर कार्रवाई की मांग की गई है।
क्या है पूरा मामला?
शिकायत के अनुसार, जनपद पंचायत कोरबा में पदस्थ सहायक आंतरिक लेखा परीक्षण एवं कराधान अधिकारी शेरसिंह डडसेना की अनुकम्पा नियुक्ति से जुड़े अहम दस्तावेज विभाग से गायब हैं। सबसे गंभीर बात यह है कि अधिकारी की पर्सनल फाइल ही उपलब्ध नहीं है।बताया जा रहा है कि नियुक्ति आदेश, मृत्यु प्रमाण पत्र और सहमति पत्र जैसे अनिवार्य दस्तावेज विभाग के रिकॉर्ड में मौजूद नहीं हैं। ये वही दस्तावेज हैं जिनके आधार पर अनुकम्पा नियुक्ति दी जाती है। ऐसे में पूरा मामला संदिग्ध और “कूटरचित नियुक्ति” की ओर इशारा करता है।
25 साल से वेतन, पर दस्तावेज नहीं!
सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि जब दस्तावेज ही मौजूद नहीं हैं, तो आखिर किस आधार पर पिछले 25 वर्षों से शासकीय वेतन का भुगतान किया जा रहा है? यह सीधे तौर पर शासन को करोड़ों रुपये की वित्तीय क्षति का मामला बन सकता है।
शिकायत में क्या मांग?शिकायतकर्ता ने प्रशासन से कई कड़े कदम उठाने की मांग की है—नियुक्ति तिथि से अब तक दिए गए वेतन का विशेष ऑडिट,गायब फाइलों के लिए जिम्मेदार रिकॉर्ड कीपर पर एफआईआर दर्ज,जांच पूरी होने तक संबंधित अधिकारी को तत्काल निलंबित किया जाए
प्रशासन में मचा हड़कंप
इस खुलासे के बाद जनपद पंचायत से लेकर जिला और राज्य स्तर तक प्रशासनिक हलकों में हलचल तेज हो गई है। सवाल यह भी उठ रहा है कि इतने लंबे समय तक बिना दस्तावेज के कोई कर्मचारी सिस्टम में कैसे बना रहा? बड़ा सवाल,क्या यह सिर्फ एक फाइल के गायब होने का मामला है, या फिर पूरे सिस्टम में मिलीभगत का बड़ा खेल?,क्या जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई होगी, या मामला ठंडे बस्ते में डाल दिया जाएगा?अब नजरें शासन के अगले कदम पर टिकी हैं—क्या इस “गायब फाइल कांड” में सख्त कार्रवाई होगी या फिर सच एक बार फिर फाइलों में दबकर रह जाएगा?















